• RSS पंकज-पत्र पर पंकज की कुछ कविताएँ

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  • RSS भाव-तरंगिनी: बिसरे कलम का मंथन

    • रघुवर तुमको मेरी लाज
      रघुवर तुमको मेरी लाज । सदा सदा मैं शरण तिहारी, तुम हो ग़रीब निवाज ॥ पतित उधारन विरद तिहारो, श्रवन न सुनी आवाज । हूँ तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो जहाज ॥१॥ अघ खण्डन दुख भंजन जन के, यही तिहारो काज । तुलसीदास पर किरपा कीजे, भक्ति दान देहु आज॥२॥  – गोस्वामी  तुलसीदास स्वर: - पंडित भीमसेन जोशी  […]
    • समर शेष है – रामधारी सिंह "दिनकर"
      दिनकर जी की कविता 'समर शेष है' की पंक्तियाँ आज के सन्दर्भ में जब अन्ना और उनके साथ पूरा भारत एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में जुटा हुआ है .. इन पंक्तियों को आज के परिपेक्ष में समझिये, दिनकर जी ने आजादी के सात साल बाद ही भ्रष्टाचार से त्रस्त हो कर ये कविता लिखी थी, आज भी वैसी ही स्थिति है।ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,किसने कहा, युद्ध की व […]
    • हमारा देश – 'अज्ञेय'
      इन्हीं तृण-फूस-छप्पर सेढंके ढुलमुल गँवारूझोंपड़ों में ही हमारा देश बसता हैइन्हीं के ढोल-मादल-बाँसुरी केउमगते सुर मेंहमारी साधना का रस बरसता हैइन्हीं के मर्म को अनजानशहरों की ढँकी लोलुपविषैली वासना का साँप डँसता हैइन्हीं में लहरती अल्हड़अयानी संस्कृति की दुर्दशा परसभ्यता का भूत हँसता है।      – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' […]
    • साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं – 'अज्ञेय'
      साँप !तुम सभ्य तो हुए नहींनगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।एक बात पूछूँ .. (उत्तर दोगे?)तब कैसे सीखा डँसना?        विष कहाँ पाया?       – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' […]
    • अपनेपन का मतवाला – गोपाल सिंह 'नेपाली'
      अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैंखो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सकादेखा जग ने टोपी बदलीतो मन बदला, महिमा बदलीपर ध्वजा बदलने से न यहाँमन-मंदिर की प्रतिमा बदलीमेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोईधो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सकाहड़ताल, जुलूस, सभा, भाषणचल दिए तमाशे बन-बनकेपलकों की शीतल छाया मेंमैं पुनः चला मन का बन […]
    • जग-जीवन में जो चिर महान - सुमित्रानंदन पंत
      जग-जीवन में जो चिर महान,सौंदर्य-पूर्ण औ सत्‍य-प्राण,मैं उसका प्रेमी बनूँ, नाथ!जिसमें मानव-हित हो समान!जिससे जीवन में मिले शक्ति,छूटें भय, संशय, अंध-भक्ति;मैं वह प्रकाश बन सकूँ, नाथ!मिट जावें जिसमें अखिल व्‍यक्ति!दिशि-दिशि में प्रेम-प्रभा प्रसार,हर भेद-भाव का अंधकार,मैं खोल सकूँ चिर मुँदे, नाथ!मानव के उर के स्‍वर्ग-द्वार!पाकर, प्रभु! तुमसे अमर दानकरने मानव का […]
    • खूनी हस्‍ताक्षर – गोपालप्रसाद व्यास
      खूनी हस्‍ताक्षरवह खून कहो किस मतलब काजिसमें उबाल का नाम नहीं।वह खून कहो किस मतलब काआ सके देश के काम नहीं।वह खून कहो किस मतलब काजिसमें जीवन, न रवानी है!जो परवश होकर बहता है,वह खून नहीं, पानी है!उस दिन लोगों ने सही-सहीखून की कीमत पहचानी थी।जिस दिन सुभाष ने बर्मा मेंमॉंगी उनसे कुरबानी थी।बोले, "स्वतंत्रता की खातिरबलिदान तुम्हें करना होगा।तुम बहुत जी चुके ज […]
    • दीप मेरे जल अकम्पित / दीपशिखा – महादेवी वर्मा
      दीप मेरे जल अकम्पित,घुल अचंचल!सिन्धु का उच्छवास घन है,तड़ित, तम का विकल मन है,भीति क्या नभ है व्यथा काआंसुओं से सिक्त अंचल!स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,मीड़, सब भू की शिरायें,गा रहे आंधी-प्रलयतेरे लिये ही आज मंगलमोह क्या निशि के वरों का,शलभ के झुलसे परों कासाथ अक्षय ज्वाल कातू ले चला अनमोल सम्बल!पथ न भूले, एक पग भी,घर न खोये, लघु विहग भी,स्निग्ध लौ की तूलिका से […]
    • हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है – 'ग़ालिब'
      हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या हैतुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या हैन शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदाकोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या हैये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसेवरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या हैचिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहनहमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या हैजला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगाकुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू […]
    • समर निंद्य है / भाग ५ और ६ – रामधारी सिंह 'दिनकर'
      भाग – ५जिनकी भुजाओं की शिराएँ फड़की ही नहीं,जिनके लहू में नहीं वेग है अनल का;शिव का पदोदक ही पेय जिनका है रहा,चक्खा ही जिन्होनें नहीं स्वाद हलाहल का;जिनके हृदय में कभी आग सुलगी ही नहीं,ठेस लगते ही अहंकार नहीं छलका;जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है,बैठते भरोसा किए वे ही आत्मबल कायुद्ध को बुलाता है अनीति-ध्वाजधारी या किवह जो अनीति-भाल पै गे पाँव चलता?वह जो […]
    • समर निंद्य है / भाग ३ और ४ – रामधारी सिंह 'दिनकर'
      भाग – ३न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है जब तक न्याय न आता,जैसा भी हो महल शान्ति का सुदृढ़ नहीं रह पाता।कृत्रिम शान्ति सशंक आप अपने से ही डरती है,खड्ग छोड़ विश्वास किसी का कभी नहीं करती है|और जिन्हें इस शान्ति-व्यवस्था में सुख-भोग सुलभ है,उनके लिये शान्ति ही जीवन - सार, सिद्धि दुर्लभ है।पर, जिनकी अस्थियाँ चबाकर, शोणित पी कर तन का,जीती है यह शान्ति, दाह समझो कुछ […]
    • समर निंद्य है / भाग १ और २ – रामधारी सिंह 'दिनकर'
      भाग – १समर निंद्य है धर्मराज, पर, कहो, शान्ति वह क्या है,जो अनीति पर स्थित होकर भी बनी हुई सरला है?सुख-समृद्धि का विपुल कोष संचित कर कल, बल, छल से,किसी क्षुधित का ग्रास छीन, धन लूट किसी निर्बल से।सब समेट, प्रहरी बिठला कर कहती कुछ मत बोलो,शान्ति-सुधा बह रही न इसमें गरल क्रान्ति का घोलो।हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त अपना मुझको पीने दो,अचल रहे साम्राज्य शान्ति का, जि […]
    • चांद और कवि – रामधारी सिंह 'दिनकर' (सामधेनी)
      रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;और लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;आज उठता और कल फिर फूट जाता है;किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आ […]
    • आग की भीख – रामधारी सिंह 'दिनकर' (सामधेनी)
      धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली […]
    • विफलता : शोध की मंज़िलें – लोकनायक जयप्रकाश नारायण
      जीवन विफलताओं से भरा है,सफलताएँ जब कभी आईं निकट,दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।तो क्या वह मूर्खता थी ?नहीं ।सफलता और विफलता कीपरिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्वबन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिएकुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।जग जिन […]
    • धरा की माटी बहुत महान – श्रीकृष्ण सरल
      धरा है हमको मातृ समानधरा की माटी बहुत महानस्वर्ण चाँदी माटी के रूपविलक्षण इसके रूप अनेकइसी में घुटनों घुटनों चलेसाधु संन्यासी तपसी भूपइसी माटी में स्वर्ण विहानइसी में जीवन का अवसानधरा की माटी बहुत महानधरा की माटी में वरदानधरा की माटी में सम्मानधरा की माटी में आशीषधरा की माटी में उत्थानधरा की माटी में अनुरक्तिसफलता का निश्चित सोपानधरा की माटी बहुत महानधरा देत […]
    • सत्य / खिचड़ी विप्लव देखा हमने – नागार्जुन
      सत्य को लकवा मार गया हैवह लंबे काठ की तरहपड़ा रहता है सारा दिन, सारी रातवह फटी–फटी आँखों सेटुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रातकोई भी सामने से आए–जाएसत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़तापथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगासारा–सारा दिन, सारी–सारी रातसत्य को लकवा मार गया हैगले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई हैसोचना बंदसमझना बंदयाद क […]
    • चीथड़े में हिन्दुस्तान – दुष्यन्त कुमार
      एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपकेजब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमज […]
    • क़दम मिलाकर चलना होगा। – अटल बिहारी वाजपेयी
      बाधाएँ आती हैं आएँघिरें प्रलय की घोर घटाएँ,पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,निज हाथों में हँसते-हँसते,आग लगाकर जलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,अगर असंख्यक बलिदानों में,उद्यानों में, वीरानों में,अपमानों में, सम्मानों में,उन्नत मस्तक, उभरा सीना,पीड़ाओं में पलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।उजियारे में, अंधकार में,कल कहा […]
    • इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है – दुष्यन्त कुमार
      इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से, ओट में जा-जाक […]
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  • प्रकाश 'पंकज' | Prakash 'Pankaj'

    प्रकाश 'पंकज' | Prakash 'Pankaj'

प्रकाश ‘पंकज’ | Prakash ‘Pankaj’


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Prakash Pankaj

मैं, प्रकाश पंकज, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का नौकर पर अपना मालिक, वर्त्तमान में सॉफ्टवेर इंजिनियर। २००८ के जनवरी से मैंने कविता लिखनी शुरू की। “इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे” मेरी पहली कविता है । मैं अपनी भावनाओं और विचारों को अक्सर कविता में ढालने की कोशिश करता हूँ पर बहुत कम बार ही सफल हो पता हूँ। मोतियाँ बहुत हैं पर मालाओं में पिरोना सीख रहा हूँ। कृपया आशीर्वाद दें !

शस्त्र भारी थे, उठता न था, लेखनी को ही अब शस्त्र बना लिया।
स्वर धीमे थे, कोई सुनता न था, लेखन को ही अब नाद बना लिया।
बस अब इतनी विनती करता हूँ  – “हे ईश्वर अब कलम न छूटे !”  – प्रकाश ‘पंकज’


मैं ब्लॉगर पर अपने चिठ्ठे प्रकाशित करता हूँ । मेरा यह चिठ्ठा मेरे समस्त चिठ्ठो को एकत्र करता है। और यह चिठ्ठा मेरा व्यक्तिगत चिठ्ठा भी है ।

मेरे चिठ्ठे:

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37 Responses

  1. excellent poetry…
    झूठी है यह “अमन की आशा”, फिर

    मंदिर मस्जिद मिट जाने दो, मरघट उनको हो जाने दो , तुम न रोपो आज शिवालय, शिव को धरती पर आने दो , फिर तांडव जग में मच जाने दो, चिर वसुधा को धँस जाने दो ।

    हंस रही हैं होलिकायें जल रहा प्रह्लाद है , कैसा यह उन्माद है

    ओ दुनिया, मेरी अर्थी पर सर न झुकाना, रोना मत, सर उठा कर फर्क्र से यूँ कहना, मार डाला उस कमबख्त को जो कहता फिरता था – “ये दुनिया एक खन्जर है !”

    दो लिंगों के आलिंगन को प्यार नहीं मैं कह सकता , सुवसनों से लाख सजा दो श्रंगार उसे नहीं कह सकता। –
    every poem of yours is marvelous am excellent piece..
    I had read you earlier..too…..keep sending.. your link by email when you post mew poem..
    you cam replace ling word by some other word…

    • Aaj fir ek roshni dekhai di hai …………//
      aao daur chale………….//

      bahut ache pankaj………..//

  2. vicharaneey prashn ek naye kon se baat kahne ka prayas.

  3. आपने अपने कवि को लेखनी दी,
    साइंस को संस्क्रति की चेतना दी!
    आशीर्वाद के पात्र और सह्योग के अधिकारी हैं,
    युग -युग तक साहित्य स्रजन के प्रभारी हैं!!
    बोधिसत्व कस्तूरिया

  4. really nice pankaj. I have always appreciated your poems and I admire your versatility in IT and hindi literature, its a rare combination we get to see.
    so, keep writing good poems and making us take pride in you.
    all my good wishes.

  5. Panakaj bhai aapki kavitaye or aapke profession ko dekh k ek prerna mili hai

  6. भई, आपके ब्‍लाग से बलम परदेसिया का एक गाना मिल गया, शुक्रिया। आपका प्रोफाइल भी देखा। बहुत साफगोई है आप में। लिखते रहिए। बहुत मजा आयेगा। आगे चलकर जिंदगी का मकसद भी समझ में आने लगेगा। अभी जो आप हैं वह तो बस आवरण है।

  7. अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आ कर …

  8. great work

  9. bhot khub likha hai aapne. yunhi likhte rahiyega.. kya aap mujhe fb par join krna chahenge.. kyuki mujhe hindi kavitayen bhot pasand hain..

  10. पंकज प्रकाश जी,
    आप बहुत अच्छा लिखते हैं |
    देशभक्ति – स्वाभिमान – सशक्त अभिव्यक्ति का अनूठा संगम है आपका ब्लॉग |
    मेरा प्रणाम स्वीकार करें |

    • आनंद जी,
      आपसे आशीर्वाद चाहिए … छोटों को तो आशीर्वाद दिया जाता है प्रणाम नहीं …
      मैं बहुत छोटा हूँ आपसे हरेक मामले में
      प्रणाम तो आपको और आपकी कलम को मेरा स्वीकार करना होगा ..

  11. Your blog is too much heart touching, u hit on govt rule, which are divided by class of peoples

  12. read a few of ur poems on ur blog bro, n they were enough to give me goosebumps a couple of times. keep up the good work bro. waiting to read more from you.

  13. aaki kalam ko salam…aapne kya khoob likha hai…

  14. Dear pankaj
    Really very good poetry, not only poetry but a great dedication towards Nation.As u have rightly mentioned in a beautiful way, here we have lots of scam-sters,desh-drohies etc. Amoung them it feels great that a young poet like u r serving Maa Bharti.I was pleased to have contact with u. thanks

  15. Mr.Pankaj,

    Today first time i read your poetries,i must say your thoughts are best. Some times it bcomes very tough to accept the fact through general languages,and you made it very easy to understand and accept it through your poetry.Wish you good luck,looking forward to read your words..

    Be blessed! Thank you!

  16. Aapki rachnaayein bahut prerna daayak hain. . .🙂

  17. u r good at wrting – u started 2 years back and doing good.. u have long way to go

  18. prakash ji aapko sadar naman ……… bahut veg hai aapki lekhani mai …. 2008 se ab tak ki aapka yatra gaurav karane layak hai …. Ap apne nam ke anurup shabdon ke punj se samaj me PRAKASH phailayenge ………shubhkamanayen

  19. पंकज जी कलम के द्वारा आप ने जो भारतियों की आत्मा को जगाने का जो बीड़ा उठाया है उससे आप माँ भारती की अनन्य सेवा कर रहे है आपकी पुकार सुन कर माँ भारती सभी को सदबुधि प्रदान करे ऐसी कामना करते है ! आप के प्रयास के लिए साधुवाद !!

  20. प्रकाश जी,,,,,आपकी रचनाओं मैं जो ओज है,,,अद्भुत है.

  21. सॉफ्टवेर इंजीनियर और लेखनी का समावेश अविश्वसनीय परन्तु सुखद तथा प्रेरणादायक है |

  22. Hats off to ur creativity……………. u r doing awesome

  23. stupendous , marvellous, bahut umda bhai aapki kavita

  24. likhte rahiye manyavar , vaise bhi jan janta .. humlog apni shudh hindi bhasha jag janni ko is bhag daud ki zindagi main bhool chuke hain …….. aap jaise naujawanon ki humein ati aoshyakta hai ,, kum se kum apni matra bhasha shudh hindi ki yaden taza ho jaya kareingi ….. apse prerna lekar mai bhi apni bhasha sudharne ki koshish karoonga

    • धन्यवाद…

      .. हिन्दी पढ़ें, हिन्दी लिखें, औरों को भी प्रेरित करें … हिन्दी को उन्नत बनाएँ..

      उधार की भाषा कहना क्या? चुप रहना हीं बेहतर होगा ..
      गूंगे रहकर जीना क्या? फिर मरना हीं बेहतर होगा ..

  25. Aapki aandolit kar dene wali kavitaon ki main bahut badi prashanshak hun…..aise hi likhte rahiye..

  26. mere paas shabd nahi hai aapki hindi k liye…bahut dino baad aisa dekhne ko mila hai…k aaj kl ka koi banda english ko chod kr hindi ka deewana hai…aapki kavitayen sach me prasansa k patr hai…aur shabdo ki to baat hi juda hai….!!

  27. Dear Sir,

    Aaj mujhe eis baat ka garv hai ki aap ke saath maine zindgi ke kuch anmol pal gujare hai. Mujhe garv hai ki aap jaisa senior mujhe mere collage mein mila. Maine wo lamhe jo aapke saath gujare hai, mujhe zindgi bhar yaad rahenge. Meri Bhagwan se prathna hai ki har janam mein mujhe aap ke jaisa senior mile.

    Aapka Mitra Bhai Subhchintak
    Anivesh Pushkar

  28. I am really inspired from your thoughts. It seems very thoughtful and commendable.

  29. intresting………..we must proud on hindi

  30. aap to bahut achchha likhate ho

  31. kya hoga u karne se chitkar,ye to aastin ke nag hai,karna hoga sanhar ,astra ka upyog kare bharat ki ye janta kare safaya chahu aur se chahe ho wo congress chahe ho wo bhartiya janta(party),kho gai baat rashtrawadi dr.hagdewar ki wo baat,ab jinhe mil jaye party dse rotiya do char bah rahi hai ek dusre ko khane ki bayar rashtr kho gaya hai in netao ne sajai apni mahfil aur sharab ki bar

  32. your poems are the best

  33. aaj aapke blog par jaane ka avasar mila…dekhkar achha laga ki koi toh hai jo apni vicharo ko is bharmit karne walon ki duniya ke samne rakh rha hai.KAFI PRERNA MILI.
    meri shubhkamna aapke saath hai… ishwar aapko sahas de ki aap is andheri duniya me gyan ke diye aapni vichron ke sahare jalate rhe.
    …aapka mitra
    ASHISH NATH THAKUR

  34. your words are genuine..

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